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शासक दलों की बदनीयती का पर्दाफाश
संविधान से पहले स्थानीय निकाय का चुनाव: ‘जनमत संग्रह द्वारा संघीयता न देने की साजिश’

-रामाशीष

नेपाल में  नया संविधान बनाने के लिए धांधली-रहित (?) चुनाव सम्पन्न हो चुका है। नेपाली कांग्रेस सभापति सुशील कोइराला के नेतृत्व में कांग्रेस और नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी (एमाले) की मिलीजुली सरकार बन चुकी है। सरकार के काम करते लगभग दो महीने हो गए हैं। फिर भी, सरकार में शामिल दोनों ही पार्टियां, संविधान बनाने की जगह, स्थानीय निकायों के चुनाव कराने की धौंस-पट्टी दे रही हैं। यह दोनों ही पार्टियां एक सांस में एक साल के अन्दर ही संविधान बना लेने का दाबा कर रही हैं। तो दूसरी सांस में, उससे पहले ही स्थानीय निकायों के चुनाव कराकर, देश भर के 3915 गांव विकास समितियों (पंचायतों) और 99 नगरपालिकाओं पर कब्जा जमा लेने की दाव में। ताकि, देश भर के गांवों से लेकर शहरी क्षेत्रों तक के लिए आबंटित विकास बजट-राशि को अपने हाथों में लिया जा सके। और, इसी के सहारे गांव-शहरों पर अपनी पार्टी का दबदबा बनाए रखते हुए अपने कार्यकर्ताओं का पालन-पोषण होता रहे। 


मालूम हो कि सीमापार भारतीय प्रान्तों के गांवों में स्थानीय निकायों (गांव पंचायतों) के चुनाव, पार्टीगत रूप में नहीं होते। इसलिए, भारतीय गांव पंचायतों एवं नगरपालिकाओं के चुनावों के सम्पन्न हो जाने के बाद भी समाज में आपसी सद्भाव पर कोई असर नहीं होता। जबकि, नेपाल में यह चुनाव पार्टीगत रूप धारण कर लेता है और संलग्न पार्टियों के बीच अपने उम्मीदवारों को जीताने होड़बाजी होती है। फलस्वरूप, चुनाव सम्पन्न हो जाने के बाद भी शान्तिपूर्ण गांवों में भी आपसी वैमनस्य कायम रहता है। 

अब जरा नेपाल के स्थानीय निकायों की संरचना को देखें। हर गांव विकास समिति में 9 वार्ड होते हैं। नगरपालिका में भी कमो-वेश 9 वार्ड ही होते हैं। लेकिन हां, काठमांडू में 17 वार्ड हैं। यही वार्ड, गांव एवं नगरों की आन्तरिक व्यवस्था संचालन की सबसे छोटी इकाई हैं । हर वार्ड कमिटी में एक प्रमुख सहित 5 निर्वाचित सदस्य होते हैं। इनमें से किसी को भी मासिक वेतन नहीं मिलते। लेकिन हां - इसीमोड, यू.एन.डी.पी, एस.जी.पी, इम्पावरमेन्ट नेपाल फाउन्डेशन (यू.एस.) और मिशिगन स्टेट यूनिवर्सिटी(यू.एस.) आदि विदेशी संघ-संस्थाओं की ओर से विकास निर्माण के लिए बड़े पैमाने पर सहयोग राशि आया करती है। इन राशियों की जमकर बन्दर-बांट हुआ करती है। उक्त विदेशी सहयोग तथा सरकार द्वारा आबंटित बजट राशि की छीन-झपट से ही गाविस एवं नगरपालिका सदस्यों की नेतागिरी का धंधा फलता-फूलता है और उनका गुजर-बसर होता है। विकास निर्माण पर तो मुश्किल से 25 प्रतिशत राशि भी नहीं लगायी जाती। हाल ही में प्रकाशित एक समाचार के अनुसार पिछले दस पन्द्रह वर्षों में स्थानीय निकाय के चुनाव नहीं कराए गए जिस कारण स्थानीय निकायों के कर्मचारियों द्वारा लगभग 16 अरब रुपये का भ्रष्टाचार किया गया। 

गणितीय हिसाब से देखें तो पता चलता है कि हर गाविस के 9 वार्डों में, प्रति वार्ड 5 सदस्य के हिसाब से, 45 सदस्य निर्वाचित होते हैं। देश भर में 3,915 गाविस तथा 99 नगरपालिकाएं हैं। कुल मिलाकर 4,014 गाविस के 36,126 वार्डों के लिए, प्रति वार्ड 5 सदस्य के हिसाब से कुल 1, 80, 630 सीटों के लिए चुनाव होते हैं। नेपाली कांग्रेस के प्रति निष्ठावान तथा राजधानी के जानेमाने वरिष्ठ पत्रकार माथवर सिंह वस्नेत बताते हैं - यदि मान लें कि एक उम्मीदवार के चुनाव प्रचार में कम से कम पांच-सात समर्थक कार्यकर्ता भी लगेंगे तो देश भर में करीब-करीब 10 लाख कार्यकर्ता संचालित होंगे। इन उम्मीदवारों और कार्यकर्ताओं पर पार्टियां अच्छी-खासी रकम भी खर्च करेंगी। इन्हीं खाए-पीए कार्यकर्ताओं  की संख्या बल का अनुमान लगाकर शासक पार्टियां, नेपाली कांग्रेस और नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी (एमाले), झटपट में स्थानीय निकाय का चुनाव करा लेना चाहती है। ताकि, इसी संचालित संख्या बल के बूते पर ‘संविधान निर्माण’ में सबसे बड़ी बाधा ‘संघीयता’ को ही सन्दर्भ-विहीन बना दिया जाए। और, यदि इसके बाद भी अधिक चीख-चिल्लाहट मचे तो जनमत संग्रह कराकर, अन्तरिम संविधान में अंकित ‘संघीयता’ को ही सदा-सदा के बिदा कर दिया जाए। क्योंकि, ‘संघीयता’ तो मूल-अन्तरिम संविधान का अंग है ही नहीं। यह तो ठहरी मधेश-विद्रोह से पैदा हुई ‘सौतेली सन्तान’ जिसे अपनाने को ‘हठधर्मिता पर अड़े हुए एक क्षेत्र-विशेष, वर्ग विशेष’ और जाति विशेष के शासक और उनकी पार्टियां, अपनाने को कतई तैयार नहीं है।

स्मरणीय है कि इससे पहले निर्वाचित संविधान सभा भी मुख्यतः ‘संघीयता’ के सवाल पर ही बिना किसी निर्णय-निष्कर्ष के विघटित हो गई। तब, नेपाली कांग्रेस और नेकपा एमाले ने ‘संघीयता’ की जिस धारणा को प्रकाशित किया था उससे तो साफ-साफ दिखता था कि ‘संघीयता’ देने पर कम से कम कांग्रेस और नेकपा एमाले तो तैयार नहीं थी। उनलोगों की यही सोंच थी कि यदि मधेशी अधिक चिल्ल-पो मचाते हैं तो नेपाल के नक्शे पर उत्तर-दक्षिण लाईन खींचकर, पांच-सात प्रान्त बना दिए जाएं। और, उक्त  सभी प्रान्तों में मधेशियों को सदा-सदा के लिए ‘अल्पसंख्यक’ बनाकर, घुट-घुटकर गुलाम की जिन्दगी जीनेे को बाध्य कर दिया जाए। तब संविधान सभा में सबसे बड़ी ‘एकीकृत नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी)’ और उनके नेता संघीयता पर जोर देते रहे। लेकिन, विभिन्न समितियों द्वारा प्रस्तुत 10 या 11 प्रान्त बनाने की सिफारिश को माओवादियों ने जोरदार समर्थन नहीं किया। आखिर क्यों ? यहीं प्रमुख पार्टियों के नेताओं नीयत में खोट दिखी और आज भी दिखती है। उन सबों की बदनीयती के कारण ही पिछली संविधान सभा ‘टांय-टांय फिस्स’ हो गयी। उस वर्गविशेष को इस बात का भारी भय है कि यदि भौगोलिक, भाषिक तथा जाति-जातियों की संस्कृति के आधार पर प्रान्त बनेंगे तो, उनका क्या हस्र होगा ? उनका किस प्रान्त में शासन होगा ? केन्द्र में उनकी क्या स्थिति रहेगी ? क्योंकि, उनकी जाति-बिरादरी के लोग किसी क्षेत्र विशेष में तो सीमित हैं नहीं। इस हालत में सत्ता का सुख सदा-सदा के लिए उनके हाथ से जाता रहेगा।  

लेकिन, हां, वर्तमान संविधान सभा में तीसरी सबसे बड़ी पार्टी एकीकृत नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) और भारतीय सीमा से लगे तराई क्षेत्र की मधेश केन्द्रित पार्टियां, वर्तमान सरकार की इस मनसा को भली-भांति भांप चुकी हैं। उनका स्पष्ट आरोप है कि नेपाली कांग्रेस और नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी (एकीकृत माक्र्सवादी लेनिनवादी), स्थानीय निकायों का निर्वाचन कराकर, जहां संविधान निर्माण की प्रक्रिया को ही फिर से वर्षों पीछे धकेल देना चाहती हैं । वहीं दूसरी ओर, संघीय राज्य बनाने के अन्तरिम संविधान के संकल्प को ही ओझल में डाल देना चाहती हैं। माओवादी नेता पुष्पकमल दहाल, पोष्टबहादुर बोगटी और पार्टी प्रवक्ता दीनानाथ शर्मा आदि ने तो यहां घोषणा कर दी है कि कांग्रेस और नेकपा एमाले की बद्नीयती को उनकी पार्टी और देश की जनता भली-भांति समझ चुकी है। इसलिए उनकी पार्टी, संविधान निर्माण से पहले स्थानीय निकायों के चुनाव कराने के हर प्रयास को विफल कर देगी। क्योंकि, दूसरी बार निर्वाचित संविधान सभा का पहला काम संविधान का निर्माण करना, न कि चुनाव कराना। जबकि, मधेशी हित की ठेकेदार पार्टियां, चुनाव में अपने नेताओं की हुई शर्मनाक हार तथा उनके द्वारा अपनी ‘राजनीति-निरक्षर’ पत्नियों को संविधान सभा में निर्लज्जतापूर्वक ठेले जाने के कारण, वह डिमोरेलाइज्ड हैं, हतप्रभ हैं। वह अभी भी संघीयता के खिलाफ रची जा रही साजिश का खुलकर विरोध नहीं कर रहे हैं कि क्योंकि उन्हें सत्तासीन पार्टी के मालिक-नेताओं से ‘सरकार द्वारा आरक्षित सीटों’ में से एक-एक सीट की भीख मिल जाने की अभी भी उम्मीद है’। 

प्रधानमंत्री सुशील कोइराला के नेतृत्ववाली ‘कांग्रेस-नेकपा (एमाले)’ सरकार के नेताओं की बड़बोली घोषणाओं पर वरिष्ठ पत्रकार तथा राजनीतिक विश्लेषक किशोर नेपाल ने तीखी चुटकियां ली है। वह एक स्थानीय दैनिक के सम्पदकीय पृष्ट पर प्रकाशित लेख में कहते हैं - ‘‘संविधान एक वर्ष के अन्दर बनेगा’’- यह,  अल्पभाषी कोइराला द्वारा सबसे अधिक दोहराए जानेवाला एकमात्र वाक्य है। मुझे तो ऐसा लगता है कि ‘यदि किसी दूर-दराज के केन्द्र’ द्वारा नये नेपाल के लिए लिखा हुआ ‘नया संविधान को अवतरित’ होना है, तो एक वर्ष के अन्दर ही संविधान आ जाएगा। और, यदि ऐसा नहीं है तो प्रधानमंत्री के उक्त कथन को ‘ब्रह्म वाक्य’ साबित होना तो दूर, उसके निकट पहुंचने की संभावना भी नहीं  दिखती’’। वह आगे बताते हैं ‘संविधान सभा गठन हुए दो महीने से भी अधिक हो रहे हैं। फिर भी, संविधान सभा अपना मुख्य काम संचालित नहीं कर सका है। संविधान सभा में न तो उत्साहजनक वातावरण है और न ही बहस और विवादों की गहमागहमी। लेकिन हां, संविधान सभा के सदस्य रोज अपनी हाजिरी लगाने जरूर पहुंच जाया करते हैं’।

इसी बीच  उप-प्रधानमंत्री का भी पद पाए ‘कम्युनिस्ट लौह-पुरुष’ वामदेव गौतम ने स्पष्ट कर दिया है कि अगले नवम्बर-दिसम्बर के पहले स्थानीय निकायों का चुनाव सम्पन्न कराना किसी भी हालत में संभव नहीं। जबकि, उनकी ही पार्टी के महासचिव ईश्वर पोखरेल ने एक भेंटवार्ता में कहा है कि संविधान निर्माण के पहले ही स्थानीय निकायों का चुनाव कराना अत्यन्त आवश्यक है। ईश्वर पोखरेल ने तो यहां तक कह दिया है कि ‘संविधान बन जाने के बाद भी उसकी विभिन्न धारा-उपधाराओं के प्रावधानों को लेकर विभिन्न प्रकार के आन्दोलन होने की संभावना को नजरन्दाज नहीं किया जा सकता। वैसी स्थिति में स्थानीय निकाय का चुनाव कराना संभव नहीं होगा, और चुनाव टलता चला जाएगा। इसलिए भी संविधान निर्माण के पहले चुनाव कराना आवश्यक है। पोखरेल के उक्त कथन का समर्थन करते हुए कोइराला नेतृत्व की सरकार में दूसरे उप-प्रधानमंत्री का पद पाए स्थानीय विकास मंत्री प्रकाशमान सिंह भी बार-बार यही कह रहे कि विकास को गति देने के लिए स्थानीय निकाय का चुनाव कराना अत्यन्त आवश्यक है। नेपाली कांग्रेस के उपाध्यक्ष रामचन्द्र पौड़ेल तो यहां तक कह चुके हैं कि यदि इस वक्त चुनाव नहीं हुए तो अगले छह-सात वर्षों तक चुनाव नहीं हो सकेगा। इसका साफ अर्थ है कि रामचन्द्र पौड़ेल यह जानते हैं कि अगले पांच वर्ष में भी संविधान बनने की संभावना नहीं है। पहले संविधान निर्माण, तब स्थानीय निकाय के चुनाव पक्षधरों का कहना है कि जब पिछले दस-पन्द्रह वर्षों तक चुनाव नहीं हुआ, तो अब और एक वर्ष रुक जाएंगे, तो कौन सा हिमाल पिघलकर मैदान बन जाएगा ? आखिर एक वर्ष में कितने अरब रुपये का भ्रष्टाचार हो जाएगा ?

इस वक्त तीन प्रमुख नेताओं के हाथों में नेपाल के शासन की बागडोर है। उनमें सबसे प्रमुख हैं - प्रधानमंत्री सुशील कोइराला, अर्थ मंत्री रामशरण महत तथा उप-प्रधान एवं गृहमंत्री वामदेव गौतम। नेपाली कांग्रेस संसदीय दल के नेता के चुनाव से लेकर प्रधानमंत्री का गद्दी सम्हालने तक, राजधानी कीे प्रिन्ट मीडिया से लेकर इलेक्ट्राॅनिक मीडिया तक में सुशील कोइराला के बारे में जो सवाल पूछे गए, उनमें सबसे अधिक सवाल थे - ‘पाकिस्तानी खुफिया एजेन्सी आइ.एस.आइ. से उनके संबंध और उसके नेपाल-भारत संबंधों पर पड़नेवाले नकारात्मक प्रभाव। वैसे पाकिस्तान के साथ संबंधों को लेकर वह पहले भी दुर्नाम रहे हैं। सन् 1990 में प्रजातंत्र की पुनस्र्थापना के बाद नई दिल्ली के इंडिया टू डे नामक पत्रिका के ‘नेपाल गेम प्लान’ शीर्षक से प्रकाशित विशेषांक में सुशील कोइराला के पाकिस्तानी रिश्ते का विस्तार से पर्दाफाश किया गया था। 

वैसे भी ‘पहाड़ी ब्राह्मण जाति के कोइराला उपनामवाले नेपाली नेताओं के पाकिस्तान और बंगलादेश के मुसलमानों के साथ बेटी-रोटी के रिश्ते रहते आ रहे हैं। पाकिस्तानी डिप्लोमैट मुहम्मद जकी के साथ बी.पी. कोइराला की सगी बहन ‘बुनू’ का विवाह हुआ था। कोइरालाओं के पाकिस्तानी भांजा-भांजी का अभी भी आना-जाना होता ही रहता है। जबकि, गिरिजा प्रसाद कोइराला की पुत्री तथा नेपाली कांग्रेस नेतृ सुजाता कोइराला की बेटी की शादी कुछ ही वर्ष पहले बंगलादेश के एक मुसलमान से हुइ थीर्। और, बंगलादेशी जमाय बाबू को काठमांडू स्थित अपने घर में रखकर, गैर-कानूनी धंधे कराने के आरोप भी सुजाता पर लग चुके हैं।  

जहां तक भारत के प्रति सुशील कोइराला की धारणा और संबंधों का सवाल है, उसके लिए हाल के वर्ष में घटी एक घटना का जिक्र करना जरूरी है। कोइराला परिवार से अति निकट तथा पूर्व भारतीय राजदूत प्रोफसर विमल प्रसाद के पुत्र तथा हाल में अवकाश ग्रहण किए भारतीय राजदूत जयन्त प्रसाद के साथ, सुशील कोइराला की हुई अप्रिय झड़प की कहानी किसी से लुकी-छिपी नहीं है। जबकि, उस वक्त सुशील किसी सरकारी पद पर भी नहीं थे। इससे पहले सन् 1991 में नेपाल में पुनस्र्थापित संसद के एक पूरे सत्र में मुंह से एक शब्द भी नहीं निकालनेवाले सुशील कोइराला ने जब पहली बार मुंह खोला, तो वह भारत विरोधी विषवमन था। उन्होंने लक्ष्मणपुर बांध को लेकर कम्युनिस्टों द्वारा भारत पर की जा रही छींटाकसी का साथ दिया था और अपने भारत विरोधी भड़ांस को ही बाहर निकाला था।  

इसी प्रकार अर्थमंत्री डाॅ. रामशरण महत का तो सारा जीवन ही पाकिस्तान को समर्पित रहा है, ऐसा बताया जाता है। काठमांडू की पत्र-पत्रिकाएं उन्हें अनेक बार पाकिस्तानी दलाल की संज्ञा दे चुकी हैं यद्यपि नई दिल्ली से प्रकाशित नवभारत टाइम्स में उनका एक खण्डन भी छपा था जिसका मोटे अक्षरों में शीर्षक था ‘‘मैं पाकिस्तान का दलाल नहीं हूं - नेपाल के विदेश मंत्री डाॅ. रामशरण महत’’। लेकिन, पाकिस्तान के प्रति उनकी वफादारी का सबसे ज्वलन्त उदाहरण है, पाकिस्तान में छपे नकली भारतीय नोटों के बंडल के साथ, रंगे हाथ पकड़े गए एक पाकिस्तानी डिप्लोमैट को नेपाली पुलिस की गिरफ्त से मंत्री-बल से बचा लेना। उक्त पाकिस्तानी डिप्लोमैट को गिरफ्तार करने के लिए उसके निवास के बाहर अपने दल-बल के साथ वरिष्ठ पुलिस अधिकारी अपने दल-बाल के साथ खड़े रहे।   और, मंत्री-पद पर कायम डाॅ. महत, उक्त डिप्लोमैट के घर में तबतक जमे रहे जबतक उसने सभी नकली नोटों के बंडल को अपने बाथरूप में जला नहीं डाला। यही नहीं भारत और भारतीयों से उन्हें इतनी अधिक अधिक चिढ़ है कि अर्थमंत्री पद का लाभ उठाते हुए ‘‘नेपाल में कार्यरत भारतीय नागरिकों की आय पर सामान्य कर के अलावा ‘20 प्रतिशत सरचार्ज’ भी लगा दिया’’।

मौलबी कट दाढ़ी के शौकीन प्रधानमंत्री और अर्थमंत्री का ही यह कमाल है तो फिर, इस दौर में वह कम्युनिस्ट नेता वामदेव गौतम ही क्यों पीछे रहें ? जिनके उपर, राजधानी के खुले मंच से एक विशाल पार्टी रैली को सम्बोधित करते हुए उनकी पार्टी के महासचिव माधव कुमार नेपाल ने ‘महाभ्रष्ट’ होने का आरोप लगाया था। बताते हैं, मिस्टर गौतम, भारतीय सुरक्षा सेवा के भगोड़े जवान हैं और उन्हें भारत से इतनी अधिक चिढ़ है कि उन्होंने ‘महाकाली संधि और पंचेश्वर पन-बिजली परियोजना’ के सदन द्वारा अनुमोदन किए जाने के विरोध में नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी (एमाले)े को ही, विभाजित कर दिया।   और, वर्षों तक अपनी डफली अलग ही बजाते रहे। फिर भी, झोपड़ी से आलीशान महलों और अरबों की सम्पत्ति के मालिक बन बैठे, कम्युनिस्टों के नेता वामदेव से भला नेकपा (एमाले) अलग-थलग रह भी कैसे सकती थी ? वह पार्टी एवं उसके नेताओं के लिए कमाउ पूत जो ठहरे। वह इससे पहले भी गृहमंत्री का पद सम्हाल चुके हैं जिसके दौरान उनपर राजधानी के कुख्यात तस्कर प्रकाश टिबड़ेवाला की मिलीभगत में ‘‘दाउदी-सोना तस्करी’’ में शामिल होने के आरोप लगे थे। और, जब पिछले संविधान सभा चुनाव में हार जाने के बावजूद, उन्हें फिर गृहमंत्री बनाया गया तो उनपर भारी संख्या में अवैध हथियारों से तराई के बेरोजगार युवकों को लैस करने के आरोप लगे थे। और, कहा गया था कि ‘गृहमंत्री गौतम अवैध हथियारों से लैस मधेशी युवकों की फौज के द्वारा ही मधेशियों को पिटवाकर, मधेश विद्रोह के प्रभाव को धूल-धूसरित करने की नीति अपनाए हुए थे। 

ऐसी स्थिति में नेपाल में नया संविधान बनने तथा राजनीतिक स्थिरता कायम होने के कितने आसार हो सकते हैं, इसका अनुमान तो नेपाल और भारत के पाठकों के अलावा विकास-कामी नागरिकों को सहज ही हो जाना चाहिए। क्योंकि, भारत अब 1962 और 1965 का भारत नहीं है जिसे चीन और पाकिस्तान की धौंस दिखाकर, दबाया-सहमाया जा सकता हो। यही सवाल नेपाल के वर्तमान निर्वाचित शासकों और प्रशासकों के समक्ष भी है। 

इसी बीच यूक्रेन के क्रिमिया क्षेत्र और रूसी-भाषी नागरिकों के बचाव में रूसी राष्ट्रपति पुटिन, रूसी सरकार और रूसी सेना, शक्ति राष्ट्र अमेरिका और यूरोपियन यूनियन की धौंस-धमकियों की परवाह किए बगैर, जिस साहस के साथ सामने आयी। वहां जनमत संग्रह और क्रिमिया का रूस में विलय हुआ, उससे नेपाल दहशत में जरूर है। नेपाल के नेता और अधिकारी दबे जुबान से भी इसकी चर्चा से भले ही कतराते हों, लेकिन नेपाली मीडिया में प्रस्तुत होनेवाले जानेमाने लेखकों और बुद्धिजीवियों इसके बारे में सांकेतिक टीका-टिप्पणियां अवश्य की हैं। उन्हें एक संस्कृति विशेष और भाषा विशेष में जीवन-यापन करनेवाले मधेशियों की मानसिकता पर शंका होने लगी है। उसमें भी जब से नेपाल-भारत सीमा पर, भारी संख्या में भारतीय सीमा सुरक्षा बल के जवानों की तैनातगी कर दी गई है, सीमा से लगे मधेश के निवासी भी अपने को अधिक सुरक्षित महसूस करने लगे हैं।

लेकिन, हां, वर्तमान दमघोंटू राजनीतिक वातावरण में ही एक डाॅ़ सी. के. राउत नामक युवा मधेशी वैज्ञानिक ने अमेरिका में अपने वैज्ञानिक पद को ठोकर मारकर, ‘आजाद मधेश’ के नारे के साथ नेपाल प्रवेश किया हैं। उन्होंने अपील की है कि ‘‘यदि मधेशियों को ‘सैकड़ो वर्षों की गुलामी’ और ‘मधेश को पहाड़ी उपनिवेश’ से मुक्त कराना है तो मधेश के युवकों को आगे आना होगा’’। उन्हें अपने जीवन की आहूति देनी होगी। क्योंकि, भारत के अंग्रेज शासकों ने मधेश और हम मधेशियों को, 1816 और 1860 की संधियों के द्वारा नेपाल के शासकों को ‘लीज’, ‘बख्शीस’ या गिफ्ट के रूप में सुपुर्द कर दिया। यहां तक कि भारत को भी 1950 की शान्ति एवं मैत्री संधि करते वक्त हमारी पीड़ा का भान नहीं हुआ। डाॅ. राउत ने हिन्दी में लिखित अपनी पुस्तकों - ‘मधेश का इतिहास’ और ‘स्वराज’ में ‘आजाद मधेश’ के पक्ष में प्रामाणिक खाका-नक्शा तथा प्रचीन काल से लेकर आज तक के  शोधपूर्ण ऐतिहासिक तथ्यों को सामने लाया है। उन्होंने काबिले तारीफ दलीलें भी दी हैं। डाॅ. राउत के पक्षधरों का कहना है कि यदि मधेशी युवक सही समय पर उठ खड़े नहीं हुए, तो मात्र दस प्रतिशत जनसंख्यावाले एक जाति-विशेष के ‘अल्पसंख्यक-शासन’ की पीड़ा की घूंट, न केवल पचास प्रतिशत से भी अधिक जनसंख्यावाले मधेशियों को, अपितु पहाड़-पर्वत के आदिवासी-जनजातियों सहित देशभर की 90 प्रतिशत बहुसंख्यक आबादी को सैकड़ो वर्षों तक पीते रहना होगा। (इति)

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