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संस्मरण : गजेन्द्र बाबू की मौत पर माछ-मदिरा की पार्टी
सदभावना साहूकारद्वारा आयोजित श्रद्धांजलि सभा
या गजेन्द्र बाबू के नाम पर 'खुद का अभिनन्दन
-रामाशीष
24 जनवरी 2002 को, नेपाल में नवनियुक्त भारतीय राजदूत डा. आइ. पी. सिंह, अर्थात नेपाल में जाना सुना नाम डा. इन्दुप्रकाश सिंह जी का पहला प्रेस भेंट कार्यक्रम था। मैं आकाशवाणी के नेपाल सिथत प्रतिनिधि रामसागर शुक्ल के साथ रिपोर्टर्स क्लब पहुंचा था। वहीं पता चला कि गजेन्द्र बाबू अब नहीं रहे। राजदूत डा. सिंह ने भरे गले से कहा 'हमने आज न केवल एक हितचिन्तक खोया है अपितु आज नेपाल-भारत मैत्री का एक बहुत बड़ा स्तंभ धराशायी हो गया है। आज भारत के एक बहुत ही बड़े हितचिन्तक का अन्त हो गया है, एक महान त्यागी चिन्तक का अन्त हो चुका है।  यह अपूरणीय क्षति है न केवल नेपाल के लिए अपितु भारत के लिए भी।

यह सुनते ही हम सभी भारतीय पत्रकार  शानित नगर सिथत नेपाल सदभावना पार्टी के केन्द्रीय कार्यालय पहुंचे। देखा अस्पताल से ही लाए गए एक स्ट्रेचर जमीन पर रखी पड़ी थी जिस गजेन्द्र बाबू चीर निद्रा में विलीन थे। स्ट्रेचर के निकट ही बैठे थे 'गजेन्द्र बाबू को कदम-कदम पर नीचा दिखाते रहनेवाले पार्टी सांसद हृदयेश त्रिपाठी। और, प्रखर भारत विरोधी एवं पाकिस्तान समर्थक एक 'दाउदी सोना तस्कर साहूकार, जिनके साथ त्रिपाठी, 'समधी जी - समधी जी, कहकर चोंच में चोंच मिलाते हुए चहक रहे थे। वहीं एक अन्य कुर्सी पर विराजमान थे तत्कालीन पार्टी उपाध्यक्ष बद्रीप्रसाद मंडल। उनमें से किसी के भी चेहरे पर शोक की छाया तक नहीं थी। एक सामान्य शव को देखकर भी किसी भी आदमी का चेहरा एक क्षण के लिए मलिन हो जाता है, जबकि मानवता के नाते भी उक्त तीनों की आंखें न तो नम हुर्इ थीं और न ही उनकी आखों में 'घडि़याली आंसू की बूंदें ही थीं। कारण यह था कि गजेन्द्र बाबू ने हाल ही में किए सांगठनिक परिवर्तन में हृदयेश त्रिपाठी को महामंत्री का पद न देकर, उन्हें उपाध्यक्ष बनाया था। पार्टी अध्यक्ष का यह निर्णय त्रिपाठी को  रास नहीं आया था और उन्होंने उपाध्यक्ष पद स्वीकार करने से मना कर दिया था। शव के आसपास बैठे सभी 'महान राजनीतिज्ञ या मधेशी हितों के ठेकेदार, गिद्ध की तरह टकटकी लगाए बैठे थे कि लाश गिरे तो नोचने का मौका मिले। तो गजेन्द्र बाबू की वह लाश गिर ही चुकी थी, बस बांकी था, लाश का अनितम संस्कार।
मैंने जाते ही कहा 'आपलोगों को दो-चार फूल भी नहीं मिले गजेन्द्र बाबू के शव पर चढ़ाने के लिए ? क्या, आपलोगों ने धूप-अगरबत्ती की कुछ तिलिलयों की व्यवस्था भी नहीं की ? मैंने तुरन्त वहां पहुंचे किसी मोटर साइकिलवाले मित्र का साथ लिया और शानितनगर से न्यू रोड सिथत मेची किराना स्टोर पहुंच गया। वहां से हवन सामग्री के कुछ डब्बे खरीदे और लौटते वक्त अपने डेरे से भागवत पुराण का एक कैसेट ले लिया। मैंने शानितनगर पहुंचकर पार्टी कार्यकर्ता मंजू अन्सारी से कहा क्या आपके पास कैसेट प्लेयर है ? उन्होंने कहा, हां है। और, वह तुरंत अपने निवास से कैसेट प्लेयर ले आयीं। मैंने कुछ फूल चढ़ाया और अगरबत्ती और हवन सामग्री के धुंए से वातावरण को पवित्र किया। कैसेट पर गीता पाठ प्रारंभ हो गया। 'रघुपति राघव राजा राम के भजन भी सुनायी देने लगे।
दूसरे दिन, अर्थात 25 जनवरी को, सुबह नौ बजे के लगभग मैं काठमांडू के टूंडीखेल मैदान पहुंचा जहां 'शहीद मंच अनितम दर्शन के लिए गजेन्द्र बाबू के शव को रखा गया था। विभिन्न पार्टियों के  नेताओं द्वारा अनितम श्रद्धांली देने का औपचारिक कार्याक्रम चल रहा था। वहीं भेंट हो गर्इ पार्टी उपाध्यक्ष बद्री प्रसाद मंडल जी से। उन्होंने मुझसे कहा रामाशीष बाबू क्या आप भी शवयात्रा में राजविराज जाना चाहेंगे, मैंने कहा हां मैं तैयार होकर ही आया हूं ? मैं वहीं से शवयात्रा में शामिल हो गया। शव को त्रिभुवन हवार्इ अडडे पर लाया गया जहां हेलीकाप्टर में शव को रखा गया।
नेपाल की सरकार की ओर से सूचना मंत्री जयप्रकाश प्रसाद गुप्ता शवयात्रा में शामिल थे। मैंने देखा सरिता गिरी, गजेन्द्र बाबू की शोक सन्तप्त पत्नी आनन्दी देवी का सिर अपनी गोद में लिए, उन्हें संत्वना दे रही थीं। हेलीकाप्टर उड़ा और कुछ ही समय में राजविराज के आकाश में पहुंच गया। आसमान से जब राजविराज को देखा तो लगा राजविराज के लोग ही नहीं अपितु वहां के मिटटी और पेड़-पौधे तक शोक संतप्त थे। हेलीकाप्टर के नीचे उतरते ही राजविराज के सभी वर्ग के लोग, चाहे उनके पोलिटिकल विरोधी ही क्यों न रहे हों, सबों की आंखों में सहज आंसू दिख रहे थे। शवयात्रा, नगर परिक्रमा का रूप ले चुका था। 'गजेन्द्र बाबू - जिन्दावाद के नारे से राजविराज आकाश गूंज रहा था। सभी के मुंह से एक शब्द निकलता था अब राजविराज वीरान हो गया। अब इस धरती पर देश-विदेश के नेताओं, राजनेताओं और राजदूतों का आगमन सपना हो जाएगा। सभी लोग एक साथ वीर गजेन्द्र अमर रहे, गजेन्द्र बाबू जिन्दाबाद के नारे लगा रहे थे।
नगर परिक्रमा के बाद शवयात्रा सप्तरी सेवाश्रम पहुंची, जो गजेन्द्र बाबू के राजनीतिक तपस्या का पवित्र स्थल था। आश्रम पर उपसिथत हजारो की जनसमुदाय ने भरे गले गजेन्द्र बाबू को अनितम बिदार्इ दिया। देश की रक्षा पंकितयों द्वारा उन्हें राजकीय सलामी दी गर्इ, और राजकीय सम्मान के साथ, सदा सदा के लिए नेपाली धरती और नेपाली राजनीति से उन्हें बिदा कर दिया गया। शव को मुखागिन दी गर्इ, चिता दहक उठी, उपसिथत लोगों की आंखों में आंसू टपक रहे थे। लेकिन, वहीं एक खादी कुर्ता-पायजामा और जवाहर बंडी पहनकर नेता बनने का ढोंग कर रहे 'मौलवी-कट दाढ़ी वाले 'छटंकी नेता, चहक रहे थे, वह पार्टी के पदाधिकारी और कार्यकर्ताओं से 'पार्टी का अध्यक्ष बनने के लिए कन्वासिंग कर रहे थे।   वहां उपसिथत अमृता जी अर्थात पार्टी की महिला नेता अमृता अग्रहरि मुझसे बताने लगीं, देखिए रामाशीष बाबू, अभी लाश पूरी तरह जल भी नहीं पायी है कि गजेन्द्र बाबू का      'तेरी सुबह की जय, तेरे शाम की जय का रट लगाकर महामंत्री बन बैठे राजेन्द्र महतो ने तो शोक इस घड़ी में ही 'खुद अध्यक्ष बनने के लिए अभियान चलाना शुरू कर दिया है, कैसा नीच है यह। इसमें मानवता नाम की चीज भी नहीं रह गर्इ है। देखिए न, कैसे उछल     रहा है ?
मैंने भी महसूस किया, यह सज्जन तो ऐसे दिख रहे थे जैसे उन्हें करोड़ों की लाटरी मिल गर्इ हो, वह उछलू राम बने जलती चिता के चारो ओर फुदक रहे थे और अपने पार्टी समर्थकों को इस बात के लिए राजी करवा रहे थे, खुद को अध्यक्ष बनाने के लिए। इसी प्रकार अनितम संस्कार के अवसर का लाभ उठाने तथा लोगों की सहानुभूति अर्जित करने के लिए रामेश्वर राय यादव भी वहां पहुंचे थे जिन्हें गजेन्द्र बाबू ने सर्लाही में हुए 'तहलका-कांड के सिलसिले में पार्टी से निकाल दिया था। रामेश्वर राय यादव पर आरोप था कि पाकिस्तानी खुफिया एजेन्सी आइ एस आइ द्वारा संचालित तहलका आपरेशन के दौरान उनके टेलीफोन से करीब तीन सौ काल पाकिस्तान के विभिन्न नम्बरों पर किए गए थे। वहीं पता चला, गजेन्द्र बाबू से हृदयेश त्रिपाठी की बोल-चाल भी बन्द हो चुकी थी फिर भी वह, दिखाने के लिए ही क्यों न सही, अनितम संस्कार में शामिल होने राजविराज सप्तरी सेवाश्रम में अपनी दस्तक दे दी थी।
चिता बुझी, अब बात आयी राजविराज से विराटनगर पहुंचने की, जहां से 26 जनवरी को विमान से काठमांडू लौटना था। उपाध्यक्ष बद्री प्रसाद मंडल, अघोषित रूप से अध्यक्ष का कार्यभार संभाल चुके थे। इसलिए इस ओहदे की जिम्मेबारी को निभाते हुए उनके द्वारा काठमांडू से राजविराज पहुंचे पार्टी नेताओं तथा कुछ पत्रकारों के लिए विराटनगर से काठमांडू का विमान टिक बुक कराया जा चुका था। हम सभी दो जीपों में सवार हुए और विराटनगर के लिए प्रस्थान कर गए। मैं जिस गाड़ी में सवार हुआ था उसमें बद्री मंडल के अलावा हृदयेश त्रिपाठी, अनिल कुमार झा, राजेन्द्र महतो आदि पार्टी पदाधिकारी भी बैठे थे। गाड़ी में बैठे नेताओं की गपोरबाजी शुरू हुर्इ। सभी गजेन्द्र बाबू के साथ का अपना अनुभव सुना-सुनाकर इस प्रकार हंसी के फब्बारे बिखेर रहे थे जैसे वह कोर्इ बहुत बड़ी जंग जीतकर लौट रहे हों या उनलोगों की कोर्इ लाटरी खुल गर्इ हो जिसकी वर्षों से उन्हें प्रतीक्षा थी।  
मैं सोचने लगा यदि यहां शोकमग्न होने की मैंने कोर्इ नैतिक चर्चा छेड़ दी तो चहकते-फुदकते इनलोगों के दिलोदिमाग को नहीं टटोल सकूंगा। इसलिए मैंने सामान्य सहभागिता दिखायी। कुछ ही देर में दोनों गाडि़यां कोशी बराज पर पहुंच गर्इं। लोगों को प्यास-पानी की तलाश भी थी। मैंने सोंचा देखूं इन्हें छेड़कर, इनका क्या रवैया रहता है। गाड़ी से उतरते ही मैंने कहा - बद्रीबाबू आपके घर आपकी ही पार्टी के इतने बड़े नेतालोग पहुंच रहे हैं, तो क्या आप अपने नेताओं को कोशी की 'नामी-गिरामी मछली जलकपूर से स्वागत नहीं करेंगे ? बस क्या था, बद्रीबाबू ने कोशी से अभी-अभी जाल में निकाली हुर्इ एक बड़ी-सी मछली खरीद ली और गाड़ी की डिकी में रखवा दिया। मछली करीब नौ-दस किलो की रही होगी। दोनों ही गाडि़यां बद्री मंडल के घर पहुंची। गप-शप चलता रहा और मछली पककर तैयार होते-होते काफी रात भी बीत गर्इ। इसी बीच खाना तैयार है, यह सूचना घर के अन्दर से मिली और सभी लोग एक ही कमरे में लगायी गर्इ कुर्सियों पर विराजमान हो गए। पहले तली हुर्इ मछली लायी गर्इ और देखते ही देखते शराब की बोतलें भी खुल गर्इं। उस जमघट में उपसिथत बद्री मंडल से लेकर हृदयेश त्रिपाठी, राजेन्द्र महतो, अनिल कुमार झा और रामेश्वर राय यादव तक के करीब एक दर्जन से भी अधिक पार्टी नेता कार्यकर्ता शामिल थे और शराब की चुशिकयों के साथ मछली का चटखारे के साथ लुत्फ उठा रहे थे। मैं भीतर से भौंचक्का था, सबों की मस्ती का लेखा-जोखा कर रहा था और सोंच रहा था कि 'इन सभी लोगों में आदमीयत है भी या नहीं। क्योंकि, श्मशान घाट के लिए जाते हुए अपरिचित शव को देखकर भी आदमी सिहर उठता है और एक क्षण के लिए सोचने लगता है कि 'एक दिन मेरा ही यही हस्र होगा। और, उनके दोनों हाथ अकस्मात प्रणाम की मुद्रा में उठ जाया करते हैं। जबकि, इन मधेशी नेताओं के चेहरे पर अपने त्यागी-तपस्वी प्रिय नेता गजेन्द्र बाबू के निधन का शोक तो दूर, वे लोग हर्ष-विभोर रहे थे। मधेश हितों के मधेशी साहूकारों इस मानवता एवं नैतिकता विहीन घिनौनी हरकतों से भरे पाप के उस क्षण को देखकर ऐसा लग रहा था जैसे मानवता और नैतिकता दोनों एक साथ कराह रही हो।
मैंने स्वतंत्र भारत के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू के निधन के बाद विपक्ष के नेता अटल बिहारी वाजपेयी को फफक-फफककर रोने की चर्चा तत्कालीन जनसंघी नेताओं से सुनी थी। प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या पर भारत की हर पक्ष-विपक्ष की पार्टियों के नेताओं को रोते हुए देखा था। यही नहीं इंदिरा गांधी के मारे जाने की खुशी में काठमांडू के न्यू रोड में लडडू बांट रहे एक सिरफिरे सिक्ख की नेपाली जनता द्वारा मज़म्मत किए जाने की घटना के बारे में भी सुना था। यहां तक कि पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी की हत्या के बाद भारत के नेताओं से लेकर नेपाल की जनता तक को रोते हुए देखा था। जबकि, इसी नेपाली धरती के ये मधेशी नेता, अपने सम्माननीय नेता गजेन्द्र बाबू के निधन पर आंसू बहाना तो दूर, अपनी खुशियों को रोक नहीं पा रहे थे, फुदक रहे थे, उछल रहे थे, उछल-उछलकर मांस-मदिरा के मजे ले रहे थे।
बद्री प्रसाद मंडल के घर की मसितयों के बाद इन सभी नेताओं के साथ मुझे भी विराटनगर के अतिथि सदन पहुंचा दिया गया जहां सभी लोगों के विश्राम की व्यवस्था की गर्इ थी। देर रात सोने के बाद भी जल्द ही जगना पड़ा क्योंकि सभी लोगों को 9 बजे हवार्इ अडडा पहुंचना था। सुबह का दृश्य भी यही देखने को मिला कि कुछ लोग अनिल कुमार झा के कमरे में गुफ्तगू कर रहे थे तो कुछ लोग हृदयेश त्रिपाठी के साथ फिसर-फिसर कर रहे थे। रामेश्वर राय यादव को चिन्ता थी यही अवसर है जब वह बद्री प्रसाद मंडल को मनाकर फिर से पार्टी में प्रवेश कर जाएं और अपना पुराना मुकाम हासिल कर लें। दूसरी ओर कद-काठी से 'छटंकी-लाल दिखनेवाले राजेन्द्र महतो का अभियान शुरू हो गया था कि अध्यक्ष पद उन्हें मिल जाए। जबकि, राजधानी का एक बहुत ही शकितशाली केन्द्र गजेन्द्र बाबू से क्षुब्ध हृदयेश त्रिपाठी को अध्यक्ष बनाने के पक्ष में लग चुका था। लेकिन, उस शकितकेन्द्र का हौसला तब पश्त हो गया जब एक पत्रकार ने उन्हें खुली चुनौती देते हुए यह कहा 'पार्टी विधान के अनुसार तो बद्री प्रसाद मंडल को ही अध्यक्ष पद सम्हालना चाहिए, लेकिन हां, जल्द ही पार्टी का महाधिवेशन बुलाकर, नये अध्यक्ष का चुनाव कर लिया जाना चाहिए। उक्त पत्रकार ने तो यहां तक चुनौती दे डाली कि इस समय तरार्इ में 'बिहार और यूपी की हवा चल रही है इसलिए उचित यही होगा कि नेपाल सदभावना पार्टी का अध्यक्ष किसी पिछड़ी जाति के ही नेता को सौंपा जाए और ऐसा नहीं किया गया तो पार्टी में विद्रोह हो सकता है। यह सभी जानते हैं कि गजेन्द्र बाबू को पार्टी के अन्दर एवं मधेश के लोगों ने जाति जाति के नजरिए से कभी नहीं देखा था।
सभी लोग विमानस्थल पहुंचे और विमान में भी वही चर्चा-चर्खा तथा कानाफुसी जारी रहा। सभी लोग कठमांडू पहुंचे और कुछ समय में भारतीय राजदूतावास द्वारा इंडिया हाउस में आयोजित गणतंत्र दिवस स्वागत समारोह में शामिल हो गए। वहां भी अन्य पार्टियों के नेता दर्द भरे शब्दों में नेपाल सदभावना पार्टी के नेता-कार्यकर्ताओं से जहां शोक व्यक्त कर रहे थे, अफसोस जता रहे थे वहीं दूसरी मधेशी नेता 'अध्यक्ष पद लूटने के लिए कानाफूसी में लगे हुए थे। अगुवार्इ राजेन्द्र महतो  कर रहे थे।
और, अन्त में हुआ वही जिसकी आशंका थी । कुछ ही दिनों के बाद पार्टी का अधिवेशन राजबिराज में आयोजित किया गया और 'राजेन्द्र महतो - हृदयेश त्रिपाठी - सरिता गिरी एण्ड कम्पनी  ने गजेन्द्र नारायण सिंह की विधवा को मनाकर, नेपाल सदभावना पार्टी को तोड़ दिया। नर्इ पार्टी का नाम रखा गया 'नेपाल सदभावना पार्टी ( आनन्दी देवी)। इसी नाम के साथ राजेन्द्र महतो, हृदयेश त्रिपाठी और श्यामसुन्दर गुप्ता आदि नेताओं ने मंत्री पद का कर्इ बार सुख-भोग किया और गजेन्द्र बाबू की अपढ़ पत्नी का जितना भी दुरुपयोग किया जा सकता था, वह किया गया। इसके लिए सारे हथकंडे अपनाए गए। यह दूसरा अवसर था जब राजेन्द्र महतो को पार्टी विभाजित करने में सफलता मिली थी। इससे पहले गजेन्द्र बाबू के जीवित रहते हुए ही, नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी (एमाले) की अल्पमत सरकार के कार्यकाल में, महासचिव माधव कुमार नेपाल द्वारा फेके गए 'लोकलेखा समिति का चेयरमैन पद का टुकड़ा और मंत्री पद पाने की लालच में, त्रिपाठी-यादव-महतो एण्ड कम्पनी ने पार्टी को विभाजितकर अलग पार्टी बनायी गर्इ थी जिसका नामकरण किया गया था 'समाजवादी जनता दल।
इसी बीच, पार्टी में हृदयेश त्रिपाठी, राजेन्द्र महतो और श्यामसुन्दर गुप्ता के बीच फिर रस्साकस्सी शुरू हुर्इ और उक्त तीनों ही राजनीतिक-साहूकारों को अनेक बार मंत्री बनने का मौका मिला। और, अन्त में ''नेपाल सदभावना पार्टी (आनन्दी देवी) को भी राजेन्द्र महतो ने फिर तोड़ा और पार्टी के नाम से ''नेपाल शब्द को निकालकर, ''सदभावना पार्टी        रख लिया । इसके साथ ही इसी  पार्टी को 'गजेन्द्र बाबू की पार्टी का असली उत्तराधिकारी बताते हुए दो अधिवेशन भी कर लिया। संविधान सभा के चुनाव की घोषणा हुर्इ और इस पार्टी ने चुनाव में भाग लिया और पहली संविधान सभा में ''सदभावना पार्टी नौ सदस्य चुनकर आए। और, उन्हें भी राजेन्द्र महतो ने उचित सम्मान के साथ पार्टी में नहीं रहने दिया।    कभी भी चुनाव में खड़ा नहीं होने वाले तथा समानुपातिक के पिछले दरबाजे से संविधान सभा में प्रवेश करनेवाले मुंशी लक्ष्मण लाल कर्ण को छोड़, अन्य कोर्इ भी सदस्य, राजेन्द्र महतो के घमंडी रवैये को बर्दाश्त नहीं कर सके। यहां तक कि, पिछले दरबाजे से ही संविधान में पहुंच चुके अनिल कुमार झा ने भी अलग पार्टी खड़ी कर ली।
अब सिथति यहां तक पहुंच गर्इ कि स्वास्थ्य मंत्री पद पर विराजमान राजेन्द्र महतो ने 'सदभावना पार्टी का जनकपुर में महाधिवेशन किया और घोषणा कर डाली कि 'उनकी पार्टी का यह पांचवां अधिवेशन है। जबकि, सच्चार्इ तो यह है कि वीरगंज में अधिवेशन करने के बाद उनकी पार्टी का यह दूसरा अधिवेशन था। राजेन्द्र महतो ने जनकपुर अधिवेशन में ही अपनी पार्टी को राष्ट्रीय पार्टी होने का दाबा करते हुए 'गजेन्द्र बाबू की नेपाल सदभावना पार्टी के मूल जड़ हिन्दी को सदा-सदा के लिए बिदा कर दिया। ऐसा नहीं है कि ''गजेन्द्र बाबू द्वारा स्थापित नेपाल सदभावना पार्टी ने सदा-सदा के लिए समाधि ले ली और नेपाल सदभावना पार्टी का तिरंगा झंडा एवं पंजा छाप चुनाव चिन्ह फटी हुर्इ पार्टी धरती में समा गर्इ, वह अभी भी जीवित है और 'एक अत्यन्त ही महत्वाकांक्षी महिला नेतृ की गोद में संजीवनी के इन्तजार में रो-कराह रही है। आज नेपाल सदभावना पार्टी के नाम पर आधे दर्जन से अधिक दल लेटरपैडी रूप में खड़े हैं।
''नेपाल सदभावना पार्टी पार्टी को छिन्न-विछिन्न करनेवाले साहूकारों ने इस हद तक जघन्य पाप कर डाला है कि संविधान सभा में चुनाव हार जाने के बाद समानुपातिक रास्ते से मिली सीटों को या तो अपनी 'राजनीति-निरक्षर बीबीयों की हैंड बैगों में डाल दिया या मधेशी जनता के समानुपातिक वोटों को सेठ साहूकारों के हाथ नीलाम कर दिया है। सदभावना पार्टी की एक महिला नेता को तो यह कहते हुए भी सुना गया कि 'अध्यक्ष जी ने संविधान सभा में सदस्यता देने के लिए नगद 20 लाख रुपया  उनसे लिया था जबकि उक्त सीट को इससे अधिक रुपया देनेवाले पार्टी के बाहर के एक व्यकित को दे दिया। अब अपना पैसा मांग रही हूं तो उसे वापस करने में वह  आगे-पीछे कर रहे हैं।
नेपाल के जानेमाने त्यागी-तपस्वी नेता गजेन्द्र बाबू के निधन की खुशी में, मछ-मदिरा की पार्टी का मस्ती लेनेवाले राजेन्द्र महतो एण्ड कम्पनी को जब 'गजेन्द्र बाबू के वार्षिक श्राद्ध के अवसर पर 'नेपाल के प्रधानमंत्री (मंत्री परिषद के अध्यक्ष) खिलराज रेग्मी तथा अन्य पार्टियों के वरिष्ठ नेताओं एवं भारत सहित अन्य कर्इ देशों के राजदूतों की आंखों में घूल झोंकते हुए 'गजेन्द्र बाबू को श्रद्धांजलि     अर्पित करने का नाटक करते देखा तो एक कविता याद आ गर्इ जिसे महतो ने साकार कर दिया।
एक बेटे को रात के अन्धेरे में,
अपना बाप और एक अदद सांप, दोनों साथ-साथ दिखे।
बेटे ने बाप को मार डाला और सांप को आस्तीन में पाल लिया।
मैंने कहा, बरखुरदार, यह तुमने क्या किया।
मारना था सांप लेकिन तुमने तो, बाप को ही मार डाला ।
बेटे ने कहा, आज जरूरत बाप की नहीं, एक अदद सांप की है,
जिसके सहारे, राजनीति की सीढि़यों पर चढ़ सकूं,
 और, हर वर्ष अपना और अपने बाप का अभिनन्दन कर सकूं।
(इति)
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