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नेपाल में स्थापित ‘गणतन्त्रत्मक लोकतन्त्र’- भारतीय लोकतन्त्र की जीत
घूसखोर मधेशी नेताओं की हार- भारत की हार कदापि नहीं 
 -रामाशीष
नेपाल में संविधान सभा के लिए दूसरी बार कराया गया निर्वाचन सम्पन्न हो चुका है । अन्तरिम संविधान के प्रावधान के अनुसार 601 सदस्यीय सदन में 575 स्थानों के लिए ही ‘प्रत्यक्ष’ तथा ‘समानुपातिक’ चुनाव कराए गए हैं । क्योंकि, संविधान में 26 स्थान, नये मन्त्रीपरिषद्द्वारा समाज के विभिन्न क्षेत्रों के जाने-माने हस्तियों को आबंटित किए जाने का प्रावधान है । नेपाल के मतदाताओं ने गत 19 नवम्बर को सम्पन्न मतदान में 575 सीटों में से 240 सीटों के लिए प्रत्यक्ष मतदान किया ।
जिसके तहत उन्होंने विभिन्न पार्टियों के अपने मनचाहे उम्मीदवारों के ‘चुनाव चिन्हों’ पर ‘स्वस्तिक’ मुहर लगाकर, अपना मत व्यक्त किया । जबकि, शेष 335 समानुपातिक सीटों के लिए मतदाताओं ने ‘अपनी मनचाही पार्टी के चुनाव चिन्ह पर स्वस्तिक छाप की मुहर लगाकर अपने मताधिकारों का प्रयोग किया ।

नेपाल निर्वाचन आयोग से प्राप्त निर्वाचन परिणामों के अनुसार ‘प्रत्यक्ष‘ और ‘समानुपातिक’, दोनों मिलाकर नेपाली कांग्रेस को 196 सीटें मिली हैं जबकि दूसरी बड़ी पार्टी नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी (एकीकृत माक्र्सवादी लेनिनवादी) ने 175 सिटें हासिल की है । इस चुनाव की सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि ‘‘बोली नहीं गोली के बल पर सत्ता हथियाने के दस वर्षीय अभियान (जनयुद्ध)’’ के दौरान लगभग 17 हजार निर्दोष नेपालियों की नृशंस हत्या के लिए जिम्मेदार ‘एकीकृत नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) को नेपाली मतदाताओं ने तीसरे नम्बर पर फेंक दिया है । उसे प्रत्यक्ष एवं समानुपातिक, दोनों ही मिलाकर केवल 80 सीटें मिली हैं । बड़बोला एवं उत्तेजनापूर्ण बन्दूकी-धौंस जमाते रहनेवाले माओवादियों के नेता पुष्पकमल दहाल ‘प्रचण्ड’ को ‘राजधानी’ के क्षेत्र नं. 10 में भारी मुंहकी खानी पड़ी है, उनकी शर्मनाक हार हो चुकी है जबकि भारतीय सीमा से लगे नेपाल के सिरहा जिले के एक सीट पर उन्हें विजयी घोषित किया गया है । वहां भी उनकी जीत को संविधान निर्वाचन अदालत में चुनौती दी गई है और आरोप लगाया गया है कि प्रचण्ड के कार्यकर्ताओं ने मतदान में जोर-जबर्दस्ती धांधली की ।
स्मरणीय है कि ‘‘प्रचण्ड ने चुनाव के केवल एक सप्ताह पहले बीबीसी से भेंट के दौरान दाबा किया था कि नेपाली जनता तो उन्हें छू लेने के लिए भी तरसती है, आमसभाओं के दौरान वृद्ध-वृद्धा तक उन्हें चूमने मंच पर आ जाती हैं । इस रूप में नेपाली जनता उन्हें ‘राष्ट्रपति’ बना चुकी है । राष्ट्रपति भवन में जाएं अथवा नहीं, अब कोई फर्क नहीं पड़ता । इसके साथ ही उन्होंने यह भी कहा था कि ‘नेपाली मतदाता का जो भी आदेश होगा, वह उन्हें स्वीकार्य होगा, चाहे चार ही सीट क्यों नहीं दे, मैं उसे भी स्वीकार करूंगा’’’ । जबकि, आज स्थिति यह है कि वह खुद अपनी तथा अपनी पार्टी की भारी हार के लिए ‘‘सेना और प्रशासन’’ द्वारा किए गए षड्यंत्र को जिम्मेदार ठहरा रहे हैं और इस हठ पर अड़ गए हैं कि जबतक एक विशेष जांच आयोग द्वारा पूरी ‘मतदान एवं मतगणना’ की प्रक्रिया की नये सिरे से जांच नहीं करायी जाती तब तक वह खुद और उनकी पार्टी के विजयी 80 सदस्य संविधान सभा की कार्यवाही में भाग नहीं लेंगे । जबकि, निर्वाचन आयोग ने स्पष्ट कर दिया है कि निर्वाचन संबंधी शिकायतों की जांच के लिए सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीशों का ‘एक विशेष अदालत’ गठित किया जा चुका है और जिस किसी को भी शिकायत है तो वह उक्त अदालत में अपनी शिकायत दर्ज करा सकता है ।  
इस निर्वाचन में एक और आश्चर्य हुआ है, वह है अपने विद्यार्थी काल से ही ‘मण्डले’ के रूप में कुख्यात तथा ‘प्रजातंत्र को रौंदकर तानाशाही शासन चलाते रहने का ख्वाब देखनेवाले राजा ज्ञानेन्द्र के अन्तिम मंत्रिपरिषद् के ‘कुख्यात गृहमंत्री’ कमल थापा की ‘राष्ट्रीय प्रजातंत्र पार्टी,नेपाल’ का संविधान सभा चुनाव में 24 सीट पाना । यद्यपि पार्टी अध्यक्ष कमल थापा खुद प्रत्यक्ष निर्वाचन में हार चुके हैं और उनकी पार्टी का एक भी उम्मीदवार प्रत्यक्ष निर्वाचन का एक भी सीट हासिल नहीं कर सका है, फिर भी ‘समानुपातिक’ चुनाव में उनके ‘गाय छाप’ को अच्छा खासा वोट मिला है । मतदाताओं की अच्छी-खासी संख्या ने अपना एक वोट भले ही किसी पार्टी के उम्मीदवार को दिया हो लेकिन उन्होंने अपनी दूसरी वोट, अर्थात् समानुपातिक वोट ‘गाय’ छाप को दिया है । मालूम हो कि कमल थापा वह एक अकेला दवंग व्यक्ति है जिसने ‘नेपाल को हिन्दू राष्ट्र घोषित करने तथा राजा को पुनः गद्दीनशीन करने का संकल्प अपने पार्टी घोषणा पत्र में अंकित किया है । लेकिन, उनके उपर आरोप है कि राजा ज्ञानेन्द्र द्वारा नेपाली जनता के प्रजातांत्रिक अधिकार हथिया लिए जाने के विरोध में नेपाली कांग्रेस के नेतृत्व में  जारी सर्वदलीय  शान्तिपूर्ण आन्दोलन को कुचलने में तत्कालीन गृहमंत्री कमल थापा, निकृष्टतम हथकंडे अपनाने से भी बाज नहीं आए थे । फलस्वरूप, संविधान सभा के लिए कराए गए प्रथम चुनाव में कमल थापा एक तरह से ‘वहिष्कृत’ और ‘अवहेलित’ तत्व के रूप में स्थापित हो चुके थे ।
इस निर्वाचन का सबसे कठोर परिणाम ‘मधेशवादी दलों’ को भोगना पड़ा है जिनके एक से बढ़कर एक तथाकथित ‘दिग्गज’ और ‘बड़बोला’ नेता, ‘स्वघोषित मधेशी-मसीहा’ चुनाव में भारी शर्मनाक मुंहकी खा चुके हैं । पूरब में मधेशी जनाधिकार फोरम (लोकतांत्रिक) के अध्यक्ष विजय गच्छदार भले ही सुनसरी जिले की एक सीट पर किसी प्रकार चुनाव जीत चुके हैं, लेकिन वह अपने पक्के दाबेवाले मोरंग जिले की सीट पर नेपाली कांग्रेस के डाॅ. शेखर कोइराला से हार चुके हैं । इसी प्रकार मधेशी जनाधिकार फोरम, नेपाल के अध्यक्ष उपेन्द्र यादव अपने दाबे के मोरंग सीट पर चुनाव हार चुके हैं और उनके साथ ही उनकी ‘परम आदरणीया’ महिला नेतृ रेणु यादव सहित अधिकांश उम्मीदवार भी प्रत्यक्ष चुनाव में हार चुके हैं । फिर, भी उन्हें प्रत्यक्ष चुनाव के 2 और समानुपातिक 8 सीटें मिलाकर संविधान सभा सदन में 10 स्थान प्राप्त हो चुका है । इसी प्रकार तराई मधेश लोकतांत्रिक पार्टी के अध्यक्ष महन्थ ठाकुर सहित उनके   ‘अति प्रभावशाली’ उपाध्यक्ष हृदयेश त्रिपाठी को इस बार पश्चिमी नेपाल में नवलपरासी की जनता ने उबकर, बुरी तरह दरकिनार कर दिया है। वह चुनाव हार चुके हैं जबकि पिछले तीन निर्वाचनों में हर बार वह अपने बने बनाए क्षेत्र से चुनाव जीतते आ रहे थे ।
अब बात रही ‘मधेशियों के स्वघोषित मसीहा’ तथा मधेश का एकमात्र स्वघोषित ‘भविष्य’  राजेन्द्र महतो साहब की, तो उन्होंने चुनावपूर्व घोषणा की थी कि उनकी पार्टी की देश भर के 75 में से लगभग 70 जिलों में शाखाएं स्थापित हो चुकी हैं । इस रूप में उनकी पार्टी अब राष्ट्रीय पार्टी बन चुकी है । और, इन बड़बोली घोषणाओं के साथ ही उन्होंने ‘‘दिल की धड़कनों’’ को इस बात का पूरा विश्वास और भरोसा दिलाया था कि  उनकी पार्टी को कम से कम 35-36 सीटें जरूर मिलेंगी । लेकिन, हुआ क्या, वही  ढाक के तीन पात बन कर रह गई ‘सद्भावना पार्टी’ और उसके मसीहा ‘महान् त्यागी वैश्यपुत्र गांधी - ‘महतो साहब’ ।
लिखते-लिखते, ‘गर्व से कहो मधेशी हैं’ - के उद्घोेषक तथा गांधीवादी नेता गजेन्द्र बाबू की याद आ गई । उनकी आंसू भरी आंखों का दृश्य सामने आ गया । राजा के फांसी के फन्दों की तनिक भी परवाह नहीं करते हुए जिस साहस के साथ उन्होंने नेपाल की प्रजातांत्रिक क्रातियों में भाग लिया और अन्त में नेपाल सदभावना पार्टी की स्थापना की, उसी मधेशी-संघर्ष की एकमात्र पार्टी को तोड़कर, क्षणिक ‘समाजवादी जनता दल’ बनानेवाले जिस त्रिमूर्ति ने गजेन्द्र बाबू को रूलाया, वह तीनों ‘महतो-यादव-त्रिपाठी’ इस बार, एक साथ चुनाव हार चुके हैं । इस पराजय से इस त्रिमूर्ति के दम्भ-पतन हुए हों या नही,ं लेकिन उनसे जुड़े कार्यकर्ता तो यह टिप्पणी करते  थकते नहीं कि ‘राजनीति कोई बिना बीबी-बच्चों के नागा साधुओं का जमावड़ा तो है नहीं । इसलिए हमारे ‘नेताओं ने यदि अपने और बीबी-बच्चों के सुखद भविष्य के लिए राजधानी में दो-चार आलीशान महल, जमीन के दो चार प्लाॅट, भारतीय शहरों में दो-चार फ्लैट, बीबी-बच्चों के लिए कुछ किलो सोना-चांदी, गहना-जेबर, गाड़ी-घोड़ा का जुगार कर ही लिया, तो इसे सामाजिक या राष्ट्रीय अपराध तो नहीं कहा जा सकता । हमारे मधेशी नेता भी आखिर मानव हैं इसलिए सामाजिक मान-सम्मान के लिए बेटा-बेटी के शादी-विवाहों के शाही जलसों में पांच-दस करोड़ उड़ा ही दिया तो इसमें क्या हर्ज ? उन्होंने यदि देश-विदेश के बैंकों में पांच-दससौ करोड़ जमा ही करा दिया है तो, यह भी कोई अपराध नहीं क्योंकि उन्हें अपने कार्यकर्ताओं को पालना है, अगला चुनाव लड़ना है । इसलिए किसी भी हालत में ‘‘नंगा-फरोश बनकर तो राजनीति नहीं की जा सकती’’ ?
लेकिन, इन सभी उतार-चढ़ाव की बातों से अलग रही, मधेशियों, आदिवासी जनजातियों और दलितों के हक हित के लिए किए गए निर्णायक आन्दोलनों के परिणामों के भविष्य की। और, इससे जुड़े विजयी पक्ष अर्थात् नेपाली कांग्रेस और नेकपा(एमाले) पार्टियों के ‘विजय उन्माद’ की। विजय परिणाम की घोषणा के साथ ही अपनी पहली प्रतिक्रिया में नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी (एमाले) के वरिष्ठ नेता तथा पूर्व प्रधानमंत्री माधव कुमार नेपाल ने यह कह डाला कि ‘1991 में निर्मित संविधान भी तो हमारा ही बनाया हुआ संविधान है। तो फिर क्यों न, उसी संविधान में कुछ फेर-बदलकर, उसे ही लागू कर दिया जाए ? क्योंकि, वह संविधान भी विश्व के सर्वोत्तम संविधानों में एक है’। इसके साथ ही नेपाल के तथाकथित जानेमाने संविधान विशेषज्ञ ‘भीमार्जुन आचार्य’ ने एक टी.वी. भेंटवार्ता में कहा ‘जनता ने माओवादियों के पहिचान सहित की संघीयता और मधेश आन्दोलन के एक मधेश-प्रदेश की मांग को ठुकरा दिया है। फिर भी यदि आवश्यक हुआ तो क्यों न देश के पांच विकास क्षेत्रों को ही प्रान्त बनाकर नये संविधान की संरचना कर दी जाए। नेपाली कांग्रेस के पार्टी-जन्मपत्री-लेखक नरहरि आचार्य तथा ‘महान् राष्ट्रवादी’ अध्यक्ष सुशील कोइराला तो पहले से ही ‘नेपाल में उत्तर-दक्षिण रेखा द्वारा पांच या सात प्रान्त बनाए जाने के घोर-पक्षधर रहे हैं’। जबकि, उपाध्यक्ष रामचन्द्र पौड़ेल तो संघीयता के विरोधी रहे हैं और नेपाली कांग्रेस के चुनावी घोषणापत्र में गणतंत्र और संघीयता उन्हें बाध्यतावश लिखना पड़ा है।
ऐसी स्थिति में सवाल उठता है कि क्या संविधान सभा में संख्या गणित के आधार पर निर्धारित प्रतिनिधित्व संख्या के कारण ‘‘मधेश आन्दोलन’’ विफल हो गया ? क्या, मधेश विद्रोह के दौरान शहीद हुए लगभग पांच दर्जन हुतात्मा युवकों का लहू पानी बन कर बह गया ? इसके साथ ही यह भी सवाल उठता है कि क्या ‘‘उपेन्द्र, राजेन्द्र, महन्थ, रामेश्वर, गच्छदार और हृदयेश’’ ही सम्पूर्ण मधेश है जिनकी हार से मधेश को ‘रांड़-मुसमात (विधवा)’ और मधेशी को पराजित माना जाए और उनकी जीत से मधेश ‘अहिवात (सधवा) और मधेशी विजयी माने जाएं ?

यह सही है कि माओवादी नेता पुष्पकमल दहाल प्रचण्ड ‘बात-बदलू’, बड़बोलेपन और ऐय्याशी के लिए नेपाली जनता के बीच कुख्यात हो चुके हैं लेकिन इसके साथ ही यह भी सच है कि वह खुद मधेशियों के वोट से ही विजयी हुए हैं और इसीलिए मधेशियों को दिए हुए अपने वायदे-वचनों पर उन्हें कायम रहना ही होगा होगा । उनके उपर लगे आरोपों को जनता के बीच गलत साबित करना ही होगा । यह सच है कि मधेश-विद्रोह से ही नेपाल में संघीयता ने अन्तरिम संविधान में स्थान पाया । लेकिन, माओवादियों ने अपने पूरे जनविद्रोह के दौरान सम्पूर्ण नेपाल के आदिवासी, जनजाति, पहाड़ी और मधेशी जनता को पहिचान सहित संघीयता युक्त संविधान देने का वायदा किया था । क्या, उन्हें अपनेे वचनों और आश्वासनों को पूरा कराने के लिए संविधान सभा में उनकी पार्टी को मिली 80 सीटें काफी नहीं है ? इसके लिए उनके सहयोगी पूर्व प्रधानमंत्री डाॅ. बाबूराम भट्टराई भी गोरखा जिले से चुनाव जीतकर आ गए हैं ।
इसलिए यदि विजय उन्माद में कांग्रेस और नेकपा एमाले के नेताओं ने अपनी ऐंठ अकड़ नहीं छोड़ी तो फिर तीसरे आन्दोलन के लिए मधेशियों, आदिवासियों, जनजातियों, दलितों और चुनाव से अलग-थलग रहे नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) के लोगों को फिर सड़क पर आने से दुनिया की कोई शक्ति नहीं रोक सकेगा ।
पिछले पांच दशकों के नेपाल प्रवास में इन पंक्तियों के लेखक के लिए सबसे अधिक प्रसन्नता की बात यह रही कि 19 नवम्बर को संविधान सभा के लिए कराए गए चुनाव की पूरी प्रक्रिया में ‘राष्ट्रवादी’ नेपाली मीडिया, नेपाली पत्र-पत्रिकाओं, राजनेताओं तथा बुद्धिजीतियों के श्रीमुख से ‘‘तथाकथित भारतीय हस्तक्षेपों’’ की कपोल-कल्पित समाचार कथाएं, स्टोरीज’’ एवं  ‘प्रायोजित लेखों’ के उल्ल्ेखनीय दर्शन नहीं हुए। मधेश में मधेशी नेताओं की हार और पहाड़ी नेताओं की जीत के कारण नेपाल के भारत विरोधी राष्ट्रवादियों को मधेशी नेताओं पर भारतीय दलाल होने का कीचड़ उछालने का साहस नहीं हुआ ।
‘‘इस अप्रत्याशित चमत्कार के श्रेय का अधिकारी कौन ? भारत सरकार, भारत का साउथ ब्लाॅक, उसकी नेपाल नीति, भारतीय राजदूतावास या चुनाव के मुंह पर खडे़ नेपाल में नियुक्त किए गए भारत के ‘भद्रलोक’ एवं ‘मृदुभाषी’ राजदूत रंजीत रे ? मेरा उन्हें सलाम, मेरा उन्हें साधुवाद’’।
यद्यपि यह सच्चाई तो बाहर आ ही चुकी है कि नेपाल में नेता,  मधेशी हों या पहाड़ी, अब भारत की नजर में कोई ज्यादा फर्क नहीं रह गया है ? एक प्राइमरी स्कूल के अदना-सा मास्टर से सीधे विदेश मंत्री बन चुके मधेशी जनाधिकार फोरम के अरबपति अध्यक्ष उपेन्द्र यादव, अपनी पार्टी के अधिवेशन में ‘‘नेपाल-भारत सीमा के अति संवदेनशील केन्द्र ‘‘वीरगंज’’ में चीनी नेताओं की सहभागिता के नाम पर लगभग चार दर्जन चीनी गुप्तचरों का जमावड़ा जुटाकर, भारत को सीघी चुनौती दे चुके हैं।  जबकि, एक अन्य ‘छटंकी’ नेता ने एक स्थानीय दैनिक को दिए हुए इन्टरव्यू में भारत को चुनौती देते हुए दाबा किया है कि उनकी तथा उनकी पार्टी की हार से मधेश में भारत विरोध बढ़ेगा। इस नेता महोदय को शायद अभी भी महसूस नहीं हुआ है कि उनकी हार उनके ‘अध्यच्छजी’(अध्यक्षजी) अहंकार में डूबे रहने तथा भाई-भतीजे, बेटी-दामाद सहित उनके खुद के रातोरात अरबपति बन जाने के भ्रष्टाचारी कर्माें और अपने कार्यकर्ताओं एवं समर्थकों के साथ निकृष्ट व्यवहारों के कारण हुई है, न कि उनके ‘स्वघोषित भारतवादी’ होने के कारण ?

नेपाल के इन मधेशी ठेकेदारों को तो शायद यह भी मालूम होगा ही कि भारत अपने युद्ध की धमकी दे रहे जानी दुश्मन तथा परमाणु सम्पन्न देश चीन-पाकिस्तान के हर हथकंडे का अपनी भूमि से बखूबी सामना कर ही रहा है, तो वह अपनी सीमा से जुड़े नेपाल के तराई क्षेत्र में बड़े पैमाने पर जारी पाकिस्तानी नकली नोटों के धन्धे में लगे चीनी-पाकिस्तानी तत्वों से भी निबट लेगा। अपने को ‘भारतवादी’ बताते हुए भारत पर धौंस जमानेवाले तत्वों से यदि पूछा जाए कि ‘पाकिस्तानी मिलीभगत से जारी नकली नोटों के धन्धे में आखिर कौन लगा हुआ है ? उनका क्या उत्तर होगा ? क्या, कभी उन्होंने खुद अपने दामन में झांकने की कोशिश की है कि वह खुद किस कदर ‘पाकिस्तानी तत्वों’ से घिर चुके हैं । क्या, उन्हें इस बात की जानकारी है कि इसी चुनाव के दौरान जनकपुर धाम में एक ऐसा पम्पलेट बड़े पैमाने पर बांटा गया जिसमें ‘चुनाव में खड़े एक दाउदी-नेता’ के पाकिस्तानी नोटों के धन्धे का पर्दाफाश किया गया था । नेपाल तराई के उसी कलैया-वीरगंज-जीतपुर क्षेत्र के कम्युनिस्ट नेता तथा पूर्व मंत्री सलीम मियां अंसारी और उसके बेटे को कौन नहीं जानता ? क्या, पाकिस्तान द्वारा संचालित भारत विरोधी गतिविधियों में इनका हाथ नहीं रहा है ? भारत को तो इन तत्वों से निबटना ही होगा और इसके लिए वह पूरी तरह सक्षम है । इसलिए घृणित रिश्वतखोरी के धन्धे के सहारे रातोरात अरबपति बन चुके स्वघोषित मधेशी मसीहों की हार को, भारत की हार मानने का कोई कारण नहीं। ऐसे स्वघोषित ‘भारतवादी नेताओं’ को तो अपने उपर लगे भ्रष्टाचार के आरोपों का कानूनी जबाब देने में जी-जान से लगना चाहिए, न कि भारत पर बड़बोला टीका-टिप्प्णी करने में । क्योंकि, ऐसे भ्रष्ट नेताओं एवं नागरिकों के लिए नेपाल के साथ ही भारतीय जेलों के दरबाजे भी खोले जा चुके हैं । संतोष की बात यह है कि अब भारत के साथ ही, नेपाल भी संयुक्त रूप में ऐसे स्वघोषित दाबेदारों के ‘पाकिस्तान लिंक’ की जड़ों तक पहुंचने में जुट चुका है ताकि भारत-नेपाल सीमा के आसपास नकली पाकिस्तानी नोटों के धन्घों से लेकर नेपाल-भारत विरोधी आपराधिक गतिविधियों पर जल्द से जल्द पाबन्दी लगाया जा सके ।
और, जहां तक ‘अपने ही कुकर्मों’ के कारण मधेशी जनता की नजरों में गिर चुके कुछ  मधेशी नेताओं की हार को, भारत की हार मानने का सवाल है, तो उन्हें याद करना चाहिए कि नेपाल को राजतंत्र से प्रजातंत्र, प्रजातंत्र से लोकतंत्र,  लोकतंत्र से गणतंत्र और अब, संघीय गणतंत्र की विन्दु तक पहुंचा देने का जो यश भारत को मिला है, उसे नेपाल के हर समझदार बुद्धिजीवी दिलो-दिमाग से स्वीकार कर रहे हैं । क्योंकि, दुनिया में किसी देश के कम्युनिस्टों ने कभी भी संसदीय बहुदलीय लोकतंत्र को स्वीकार नहीं किया है और न ही वहां संसद या संविधान सभा के लिए चुनाव कराए गए हैं । जबकि, नेपाल में सबसे पहले, नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी (एमाले) और अब एकीकृत नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) भी,  लोकतंत्र के विश्वमान्य सिद्धान्तों को स्वीकार करते हुए संविधान सभा के लिए कराए गए दो-दो निर्वाचनों में भाग ले चुके हैं और संसद द्वारा निर्वाचित राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति तथा प्रधानमंत्री आदि पदों का साक्षात अनुभव करते हुए, देश का प्रशासन सम्हाल चुके हैं । और, नेपाल में ‘राजाविहीन’ लोकतांत्रिक संघीय गणतंत्र स्थापित हो जाना ही, भारत की सबसे बड़ी जीत है । क्योंकि, जिन माओवादियों और कम्युनिस्टों को नेपाल में स्थापित प्रजातंत्र को तहस-नहस करने के लिए खड़ा किया गया और नेपाल पर थोपा गया था, वह सभी आज लोकतांत्रिक प्रणाली को स्वीकार कर चुके हैं ।
यहीं याद आती है ‘भारत-शेरनी’ इंदिरा गांधी की, जिन्होंने बंगलादेश के  उदय के बाद भारत की नीतियों को विश्व समुदाय के समक्ष स्पष्ट करते हुए घोषणा की थी - ‘‘डेमोक्रैसी’ एण्ड ‘इंडियन्स एब्राॅड’ - भारत का आन्तरिक’ मामला है’’। इसलिए लोकतंत्र की स्थापना के लिए विश्व के हर लोकतांत्रिक संघर्ष को भारत का नैतिक समर्थन मिलता रहेगा और इसी प्रकार विश्व के किसी भी देश में जा बसे भारतीयों पर आनेवाली हर विपदा से निबटने में उन्हें भारत का साथ रहेगा । और, नहले पर दहला देते हुए  भारतीय संसद में विपक्ष नेता अटल बिहारी वाजपेयी ने रामलीला मैदान के खुले मंच से इंदिराजी की मुक्त कंठ से प्रशंसा करते हुए उद्घोष किया - ‘‘आज भारत में कोई पार्टी नहीं है, आज सम्पूर्ण भारत  ‘एक पार्टी है’ और उसकी एकमात्र नेता है - इंदिरा गांधी, हम सभी आपके साथ हैं ।
इसलिए नेताजी, अभी भी अपनी छवि सुधारने में लगिए, अन्यथा मधेश की नई युवा पीढ़ी आपको सदा-सदा के लिए नेपाली राजनीति से दूर फेंक देंगी और आप कहीं के भी नहीं रह जाएंगे । अतः ‘भारत-गुहार’ के द्वारा भ्रांति फैलाकर भारत को बदनाम करने की कोशिश से बाज आइए, भारत पुकार से दूर जाइए, भारत को कलंकित मत कीजिए। (इति)
 काठमांडू, नेपाल,
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